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Types and symptoms of worm infection in kids in Hindi – othershealth

Worm infection
Worm infection

Worm infection

बच्चों में worm infection या पेट में कृमि होना या आम समस्या है, जिसे अभिभावक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. यह इन्फेक्शन कई तरह के वर्ण से होता है जिसे मेडिकल टर्म मैं हेलिमंथ या आंत का कीड़ा कहा जाता है. यह वह वास्तव में पैरासाइट या परजीवी होते है,

जिनके अंडे, लार्वा या कीड़े मुंह से निकलने पर या नंगे पैर चलने से त्वचा में सीधे घुसकर किसी भी माध्यम से बच्चों के शरीर में पहुंच जाते हैं. उनसे पोषण पाकर वॉर्म बहुत तेजी से मल्टीपल होकर अपनी संख्या बढ़ाते हैं. धीरे-धीरे बच्चे के शरीर के दूसरे अंगों तक फैलकर यह इन्फेक्शन फैलाते हैं.

चूंकि यह कृमि बच्चे के शरीर में आंतों में ही नहीं, खून में भी रहते हैं और उनसे पोषण प्राप्त करते हैं. समुचित उपचार न कराने पर आंतों में रक्तस्त्राव हो सकता है, जिससे बच्चे में स्वास्थ्य संबंधी समस्या पैदा हो जाती है. उनमें आयरन और प्रोटीन की कमी हो जाती है और वे एनीमिया का शिकार हो सकते हैं.

भूख ना लगने के कारण उन में पोषक तत्वों की कमी और कमजोरी आ जाती है. बच्चे का वजन कम हो सकता है. Tapeworm  दिमाग तक पहुंचकर इंफेक्शन फैलाते हैं, जिससे दिमाग में गांथे बनने लगते हैं और बच्चे का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो जाता है.

 किया है स्तिथि worm infection होने की??

विश्व स्वास्थ्य संगठन ( who ) के अनुसार, दुनिया भर में तकरीबन 83 करोड़ बच्चों में परजीवी आंतों के कीड़े होने का खतरा है. भारत में 1 से 14 साल की उम्र के करीब 24 करोड़ बच्चे पेट में कीड़े होने की समस्या से पीड़ित है.

भारत सरकार ने के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 10 फरवरी को नेशनल डी वार्मिंग डे घोषित किया, जिसका उद्देश्य 1 से 19 साल के बच्चों को कृमि मुक्त करना है. 2015 से यह अभियान भारत के सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में चलाया जा रहा है.

इस अभियान के तहत केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ता और अन्य वालंटियर स्कूलों, पंचायत, स्वास्थ्य केंद्रों पर बच्चों को डी वार्मिंग की दवाइयां खिलाते हैं.

 कृमि के प्रकार और उनके  संक्रमण के लक्षण:

Pinworm: pinworm माल द्वारा मुंह में फैलते हैं और ज्यादातर आंतों और मलाशय में रहते हैं. रात में मादा वॉर्म मलद्वार के आसपास की त्वचा पर अंडे देने बाहर आती है, जिससे रात को सोते समय बच्चे अपना मल द्वार खुजलाते हैं.

लार्वा उनकी उंगलियों में चिपक जाते हैं. गंदे हाथ से खाना खाने या पानी पीने से वॉर्म दोबारा मुंह में चले जाते हैं. उनकी साइकिलिंग होती रहती है इसके अंडे कपड़े, बिस्तर पर भी जीवित रह सकते हैं और छूने यहां सांस लेने पर अंदर चले जाते हैं.

 लक्षण:

इसके मरीज को पेट दर्द, रात को नींद नहीं आती, बेचैनी रहती है. मलद्वार में जलन-खुजली, उल्टी होने जैसी समस्या होती है.

 Hookworm:

लारवा दूषित मिट्टी या जमीन पर मौजूद होते हैं. बच्चों के नंगे पैर चलने से त्वचा में घुसकर शरीर में पहुंच जाते हैं. फेफड़ों से होते हुए छोटी आंत की दीवारों पर चिपक जाते हैं, जहां रक्त चूसते हैं.

Symptoms: पेट में दर्द, भूख ना लगना, हीमोग्लोबिन की कमी से एनीमिया होना, वजन कम होना, शरीर में खुजली, दाने, स्वास संबंधी समस्याएं.

Tapeworm: बिना धुली फल, सब्जियां, मांस, मछली में tapeworm पाए जाते हैं. इससे दूषित भोजन खाने पर लार्वा शरीर में पहुंचकर आंत की दीवार पर चिपक जाते हैं. पाचन प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है भूख कम हो जाती है.

जिससे बच्चे का वजन कम हो जाता है समुचित उपचार न किए जाने पर एक रक्त प्रवाह के साथ दूसरे अंगों तक पहुंच जाते हैं. वहां त्वचा के नीचे द्रव से भरे सिस्ट बनाते हैं. दिमाग में लारवा के जाने से न्यूरो सिस्टस्कॉर्सिस बीमारी हो जाती है.

वॉर्म लीवर या फेफड़े में भी चले जाते हैं, जो फटने पर जानलेवा भी हो सकता है इसे हाईडेटिड रोग कहा जाता है.

लक्षण

मरीज को खांसी, पेट दर्द, उल्टी, कमजोरी, डस्ट, डायरिया, द्रव से भरे सिस्ट होते है. न्यूरो सिस्टस्कोर्सिस होने पर बच्चे को मिर्गी का दौरा, सिर दर्द, उल्टी आदि हो सकते हैं.

Roundworm: कुत्ते, बिल्ली आदि पालतू जानवरों के मल में पाए जाते हैं. मिट्टी में खेलने वाले बच्चों के हाथ पैर में चिपक जाते हैं. बिना हाथ धोए खाने पीने से बच्चे के शरीर में पहुंच जाते हैं और मल्टीपल होकर रक्त के साथ पूरे शरीर में फैल जाते हैं. कई मामलों में हाथ पैर की त्वचा के नीचे रेंगते हुए दिखाई देते हैं. इस बीमारी को कियोटेनिया लारवा माइग्रेन क्रॉपिंग इरापशन कहा जाता है.

लक्षण: बुखार, खांसी, जुकाम, तिल्ली, लीवर, फेफड़ों में सूजन, पूरी बॉडी में खुजली, दर्द आदि.

कैसे करे बचाव:

1. Worm infection से बचने के लिए जरूरी है कि बच्चे में साफ सफाई रखने की आदत डालें. कुछ अन्य एहतियात बरत कर इससे बचाव कर सकते हैं.

2. हाइजीन का ध्यान रखें. निजी अंगों की नियमित सफाई करें. नाखून काटे क्योंकि इनमें वर्म के लारवा छुपे रह जाते हैं.

3. बाहर जाते समय चप्पल जूते अवश्य पहने. खेलने के बाद अच्छी तरह हाथ पैर धोएं. पानी, कीचड़ या नदी तालाब के आसपास खेलने से बचें.

4. शौच के बाद फ्लश का प्रयोग जरूर करें और शौचालय की साफ सफाई का ध्यान रखें. साबुन से हाथ जरूर धोएं. खुले में शौच ना करें. यहां वॉर्म पनपते हैं, जो मिट्टी और जल प्रदूषित करते हैं. जहां तक हो सके सार्वजनिक शौचालयों में जाने से बचे. खाना खाने से पहले अच्छी तरह हाथ धोएं.

5. फल सब्जियां अच्छी तरह धोकर पकाया. देर से कटे फल सब्जियां है या बासी खाना ना खाएं. सुनिश्चित करें कि मांसाहारी खाद पदार्थ कच्चा या अधपका ना हो. उबला पानी पीने की आदत डालें. सार्वजनिक नलों से पानी पीने से बचें.

इन सभी चीजों को आप निजी ज़िन्दगी में अपना कर worm infection से बच सकत है. और अपने बच्चो को भी बचा सकते है.

Worm infection के बारे में ज्यादा जानकारी पाने के लिए आप किसी अच्छे डॉक्टर से संपर्क कर सकते है.

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