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मां व शिशु के लिए जरूरी है प्रेग्नेंसी के ये टेस्ट – pregnancy test in Hindi

Pregnancy test in Hindi
Pregnancy

प्रेग्नेंसी जांच ( pregnancy test in Hindi )

pregnancy test – भारत में गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं के कारण हर साल करीब 45000 महिलाएं दम तोड़ देती है, जो विश्व के आंकड़ों का 17 फ़ीसदी है. वही 4.8 फ़ीसदी बच्चों की मौत 5 साल की उम्र से पूर्व हो जाती है, जिसका मुख्य कारण प्रेग्नेंसी के दौरान और उसके बाद मां-बच्चा का सही से चेकअप ना होना है.

प्रेगनेंसी के दौरान जितने भी टेस्ट कराए जाते हैं, उनका संबंध नॉर्मल डिलीवरी और स्वस्थ बच्चे से होता है. लेकिन कई महिलाएं प्रेग्नेंसी से जुड़ी जांचों को ज्यादा तरजीह नहीं देती.  जबकि सरकारी अस्पतालों में गर्भवतीओं के लिए कई टेस्ट फ़्री भी है.

केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों की ओर से भी स्वस्थ गर्भावस्था के लिए सहायता राशि मदद भी दी जाती है, पर जागरूकता की कमी के कारण ज्यादातर महिलाएं इसका उचित लाभ नहीं उठा पाती है.

कहीं जागरूकता की कमी है, तो कहीं इलाज की सुविधा का अभाव. गर्भावस्था के दौरान जितनी भी मेडिकल चेकअप, स्क्रीन टेस्ट होते हैं, वे गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है.

कंसीव करने के बाद जब आप पहली बार डॉक्टर से मिलेंगी, तो आपसे आपके और आपके परिवार की मेडिकल हिस्ट्री पूछी जाती है. इसके बाद अन्य जांच की सलाह दी जाती है.

पहली तिमाही में अल्ट्रासाउंड कराया जाता है. इससे पता चलता है कि गर्भाशय में कितने भ्रूण पल रहे हैं. प्लेसेंटा की संरचना कैसी है. भ्रूण में असमानता दिखे, तो उसका भी पता लगाया जाता है.

साथ ही प्रसव की सही तारीख पता लगाई जाती है. इसके बाद रूटीन एंटीनेटल टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है. जिसमें हेमोग्राम, रेडम ब्लड शुगर टेस्ट, TSH, रूटीन यूरिन टेस्ट, रूबेला, IGG, VDRS, वायरल मेकर्स, हेपेटाइटिस बी और सी, एचआईवी और थैलेसीमिया की स्क्रीनिंग के लिए HPLC टेस्ट शामिल है.

11 से 14 सप्ताह के बीच स्क्रीनिंग | pregnancy test in Hindi |

इसमें भ्रूण का अल्ट्रासाउंड और मां के रक्त की जांच की जाती है. इसमें जन्मजात विकृति के बारे में पता लगाने का परयास किया जाता है. इसमें गर्भ में पल रहे बच्चे की गर्दन के पीछे की ओर जो फ्ल्यूड होता है, उसे मापा जाता है.

यदि न्यूकल ट्रांसलूसेंसी स्कैन में उसकी मात्रा बढ़ी हुई हो, तो डाउन सिंड्रोम का खतरा रहता है.

डबल मार्कर ब्लड टेस्ट | pregnancy test in Hindi |

इसमें क्रोमोजोम से संबंधित असामान्यताओं जैसे- डाउन सिंड्रोम, एडवर्ड सिंड्रोम आदि की जांच की जाती है. यदि स्क्रीनिंग टेस्ट असामान्य आते हैं, तो डायग्नोसिस से इसकी पुष्टि करने के लिए कुछ और टेस्ट भी कराए जाते है.

दूसरी तिमाही में 13 से 38 सप्ताह

क्रोमोजोम कि आसामान्यता का पता लगाने के लिए पहली तिमाही में कोई टेस्ट नहीं किया हो, तो दूसरी तिमाही में ट्रिपल मार्कर टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है. इस में भ्रूण के विकास की जांच और जन्मजात में किसी प्रकार की विकृति की आशंका को समाप्त करने के लिए लेवल-2 अल्ट्रासाउंड किया जाता है.

अगर कोई असमानता दिखाई देती है, तो उसकी विस्तृत जांच की जाती है. 18 से 20 सप्ताह के बीच में एक और लेवल 2 अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है. इस समय भ्रूण की संरचना, रक्त के प्रवाह को पैटर्न, गर्भ में भ्रूण की गतिविधियों की जांच की जाती है.

वहीं 24 से 26 सप्ताह के बीच जस्टएंसेल डायबिटीज का पता लगाने के लिए ग्लूकोज चैलेंज टेस्ट किया जाता है. गर्भावस्था के 24वें सप्ताह में फीटल इकोर्डियोग्राम टेस्ट किया जाता है.

इस टेस्ट को कराने का सुझाव उन महिलाओं को दिया जाता है, जिनकी गर्भावस्था अत्याधिक रिस्की हो या पहले विकसित भ्रूण में हृदय से संबंधित जन्मजात विकृतियां थी. इसके बाद गर्भ की स्थिति की जांच के लिए अल्ट्रासाउंड किया जाता है.

Reference

यह भी पढ़ें :- तबीयत बिगाड़ ना दे यह मौसम | viral infection in Hindi |

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