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Atrophic vaginitis के लक्षण, इलाज, कारण, दवा और उपचार – othershealth

Atrophic vaginitis
Atrophic vaginitis

Atrophic vaginitis

जरूरी नहीं है कि मेनोपॉज के बाद हर महिला को ड्राइनेस और इंटरकोर्स के दौरान दर्द हो. यह दिक्कत है उन महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती है जिनकी सेक्सुअल लाइफ एक्टिव नहीं है यानी एक्टिव सेक्सुअल लाइफ atrophic vaginitis से बचाती है.

मेनोपोज के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी हो जाती है. इसके कारण उनकी ओवेरी काम करना बंद कर देती है. अंडाशय से अंडे का स्राव नहीं होता है और मासिक धर्म होना बंद हो जाता है.

इसकी वजह से वजाइना और योनि मार्ग में लुब्रिकेशन कम हो जाता है. यह रूखी होने लगती है. वजाइना में सूजन, जलन-खुजली, सूखापन और श्वेत प्रदर आदि की समस्या शुरू हो जाती है. मूत्रमार्ग थोड़ा सिकुड़ जाता है.

सूखापन ज्यादा होने से यूटीआई की समस्या भी देखने को मिलती है. इस पूरी समस्या को atrophic vaginitis कहते हैं. कभी-कभी यह रोग vagina को अति संवेदनशील बना देता है, जिससे वहां संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.

पीएच बलैंस में गड़बड़ी:

आमतौर पर वजाइना का पीएच एसिटिक होता है और यह 4.5 या उससे कम होता है. एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से वजाइना के पीएच वैल्यू में बदलाव आता है. प्राकृतिक रूप से vagina में सूक्ष्म जीव होते है,

जिनमें lactobacillus जैसे अच्छे जीवाणु भी होते हैं, जो वजाइना के एसिटिक पीएच को मेंटेन रखते हैं. लेकिन atrophic vaginitis में इसका पीएच बैलेंस गड़बड़ा जाता है. इससे vagina और मूत्र मार्ग में बैक्टीरियल व फंगल इंफेक्शन का खतरा रहता है.

यह भी जरूरी नहीं है कि मेनोपॉज के बाद हर महिला को ड्राइनेस और इंटरकोर्स के दौरान दर्द हो ही. जैसे-जैसे वजाइनल डिस्चार्ज बढ़ता है. ये समस्याएं बढ़ जाती हैं. ये दिक्कत उन महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती है,

जिनकी सेक्सुअल लाइफ एक्टिव नहीं है यानी एक्टिव सेक्सुअल लाइफ atrophic vaginitis से बचाती है. जिनकी नॉर्मल डिलीवरी हुई हो या जो महिलाएं सेक्सुअली एक्टिव हो, उनमें  यह समस्या कम होती है.

करीब 40% महिलाओं में atrophic vaginitis की समस्या देखी जाती है. एस्ट्रोजन हार्मोन सेक्स ड्राइव को बूस्ट करता है. हारमोंस का खत्म होने पर महिलाएं सेक्स से कतराती है. इससे कई महिलाओं को atrophic vaginitis होने की आशंका होती है.

यह डिस्चार्ज डायबिटीज के मरीजों में भी देखा जाता है, क्योंकि उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है. इसकी वजह से उन्हें फंगल इंफेक्शन का खतरा अधिक होता है. इस रोग के कई और कारण भी हो सकते हैं

ब्रेस्ट कैंसर में जिन्हें hormonal therapy दी जा रही हो, जिन्हें ल्यूकोरिया या वाइट डिस्चार्ज की दिक्कतें हो, इलाज के लिए कीमो थेरेपी या रेडियोथैरेपी दी जा रही हो, उन्हे भी वजाइनल ड्राइनेस की दिक्कत आती है. पेट के कैंसर व सर्वाइकल कैंसर में भी रेडियोथैरेपी दी जाती है. ऐसे मरीजों की ओवरी रिमूव करनी पड़ती है.

Atrophic vaginitis के लक्षण

आमतौर पर रजोनिवृत्ती के छह-सात महीने बाद इसके लक्षण देखे जाते हैं. कुछ महिलाओं को या समस्या 5 से 6 साल बाद भी होती है. कुछ महिलाओं में atrophic vaginitis के लक्षण मेनोपॉज से पहले भी दिखाई देते है.

एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से वजाइना में सूजन आ जाती है. वजाइना में नमी की कमी हो जाती है. योनि मार्ग कम लोचदार और अधिक नाजुक हो जाता है. इंटरकोर्स के दौरान दर्द होता है. वाइट डिस्चार्ज होता है. पेशाब करते समय दर्द व जलन, बार बार पेशाब आने का एहसास और यूरिनल संक्रमण आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

बरतें सावधानियां:

Atrophic vaginitis के मरीजों के लिए जरूरी है कि वजाइना के हाइजीन जिंदा ख्याल रखें. उसे पूरी तरह से सूखा रखें. ताकि फंगल संक्रमण ना हो. सूती व धूप में सूखे हुए अंदर गारमेंट ही पहने.

जांच व इलाज :

मरीज की केस हिस्ट्री के अलावा एस्ट्रोजॉन की जांच की जाती है. जरूरत पड़ने पर स्मियर टेस्ट, ph का एसिटिक टेस्ट, ब्लड टेस्ट व यूरिन टेस्ट आदि कराया जाता है. कई महिलाएं वजाइना और उसके आसपास नारियल तेल लगाती है.

Vaginal infection होने पर मरीज को वजाइना क्षेत्र में एस्ट्रोजन लुब्रिकेटिंग जेल और क्रीम दिन में दो बार लगाने के लिए दी जाती है. यह जेल वजाइना क्षेत्र को नार्मल करती है. जिससे उन्हें आराम मिलती है इस तरह के जेल का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है.

अगर हॉट फ़्लैश आ रही हो, तो मरीज को ओरल एस्ट्रोजन हार्मोनल मेडिसिन दी जाती है. हॉट फ़्लैश में महिला को बहुत  गर्मी लगती है, पसीने आते हैं, घबराहट होती है, उनकी स्किन ठंडी हो जाती है और उन्हें ठंड लगने लगती है. फंगल इंफेक्शन होने पर एंटीफंगल दवा दी जाती है इस स्थिति के हिसाब से उपचार 3 या 6 महीने तक का हो जा सकता है.

डायबिटीज के मरीजों को फंगल इनफेक्शन अधिक होता है. उन्हें एंटीफंगल टेबलेट व vaginal पेसरीज दी जाती है. ब्लड कंट्रोल होने से फंगल इनफेक्शन कम होता है. इनका वजाइनल फ्लोरा लैक्टोबैसिलस जीवाणु की वजह से गड़बड़ा जाता है. उसे ठीक करने के लिए स्पेशल कंबिनोम मेडिसन दी जाती है. कैंसर के मरीजों को ओरल मेडिसिन नहीं दी जाती है.

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