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हाई ब्लड प्रेशर साइलेंट किलर

तेज रफ्तार जिंदगी में अव्यवस्थित जीवन शैली, ओवर वर्क लोड, चिंता, तनाव आदि हाई ब्लड प्रेशर की मुख्य वजह है. हाई बीपी या हाइपरटेंशन को डॉक्टर साइलेंट किलर भी कहते हैं, जिसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह कई बीमारियों का प्रमुख कारण बन सकता है.

हाई ब्लड प्रेशर से किन अंगों को होता है नुकसान

आज कल की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास अपने लिए भी समय नहीं है. वर्कप्लेस पर बढ़ता वर्कलोड और स्ट्रेस के कारण युवा अनजाने में हाइपरटेंशन या हाई ब्लड प्रेशर के शिकार हो रहे हैं. इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है.

वजन बढ़ना और व्यायाम नहीं करना भी इसके कारण है. हाय बीपी या हाइपरटेंशन किसी भी उम्र के लोगों मैं हो सकता है. इस बीमारी में धमनियों में खून का प्रवाह बढ़ता है जिससे दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. 
शरीर में रक्त संचार भी सामान्य से ज्यादा होता है. हाई ब्लड प्रेशर के बने रहने से दिल को अतिरिक्त दबाव में रहना पड़ता है. धीरे-धीरे दिल की मांसपेशियां मोटी होने लगती है, ऐसी स्थिति में शरीर को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है. 

युवा वर्ग में यह बीमारी तेजी से फैल रही है. हाइपरटेंशन कोई जानलेवा बीमारी नहीं है, मगर यदि शरीर में यह बीमारी अधिक दिनों तक रह जाती है, तो शरीर के अन्य अंगों के डैमेज होने का खतरा हो सकता है.
इसलिए यह बीमारी काफी घातक साबित हो सकती है. यह बीमारी अधिकतर  तनाव की देन है साथ ही लंबे समय तक रहने वाली बेचैनी से भी यह रोग हो सकता है. 

इस बीमारी के कारणों में ठीक से नींद ना ले पाना एवं तम्बाकू और शराब का सेवन भी शामिल है. मोटापे से ग्रस्त लोगों में डायबिटीज ज्यादा होती है, ऐसे लोग भी हाइपटेंशन से ग्रस्त हो जाते हैं.

हालांकि दवाइयों के माध्यम से इस बीमारी से निजात मिलना संभव है. मगर यदि आप अपनी लाइफ स्टाइल नहीं बदलेंगे, तो यह बीमारी एक समय के बाद फिर आपको अपना शिकार बना लेगी. इसके लिए जरूरी है कि आप अपने लाइफ स्टाइल बदल ले |

कई प्रकार के होते हैं हाइपटेंशन 

  • व्हाइट कोर्ट हाइपटेंशन : इस प्रकार में बीपी बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, मरीज की स्थिति अत्यधिक नाजुक होती है, ऐसे मरीजों को चिकित्सक की देखरेख में रहना पड़ता है.
  • बॉर्डरलाइन हाइपटेंशन :  इसमें बीपी अधिक नहीं होता, मगर दिल और किडनी अत्यधिक प्रभावित होते हैं. 
  • पर्शियल हाइपटेंशन : इसे एपीसोडिक हाइपटेंशन भी कहते हैं. बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को दिन में किसी खास वक्त तनाव या बेचैनी की समस्या होती है. ऐसे मरीजों का बीपी दिन के किसी खास वक्त में अचानक बढ़ जाता है. 
  • प्रेगनेंसी में हाइपटेंशन : प्रेगनेंसी में इसके मामले 8 से 10% ही देखने को मिलते हैं. यदि 6 घंटों तक हाइपरटेंशन की माप 140/90 mmhg से अधिक रहती है तो इसे हाइपरटेंशन समझा जाता है. प्रेगनेंसी की शुरुआत में हाय बीपी, प्री एकलेंपिस्या का संकेत हो सकता है. 
  1. रोग प्रेग्नेंसी के मध्य में गंभीर रूप धारण कर सकता है. बीपी हाई हो जाना तथा मूत्र में प्रोटीन की उपस्थिति प्रमुख लक्षण होते हैं. प्री एक्लेंपसिया प्रेगनेंसी के लगभग 5% मामलों में होता है और विश्व स्तर पर सभी मातृ मृत्यु के लगभग 16% मामलों के लिए जिम्मेदार होता है.
  2. यह प्रेगनेंसी के दौरान बच्चों की मृत्यु के खतरे को भी दोगुना करती है. सिर दर्द, उल्टी, पेट में दर्द आदि प्री एक्लेंपसिया के प्रमुख लक्षण है. यदि बीमारी की रोकथाम समय रहते नहीं की गई, तो गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है. अतः महिलाओं को प्रेगनेंसी में ब्लड प्रेशर की नियमित जांच करानी चाहिए.
  3. हर व्यक्ति का ब्लड प्रेशर दिनभर बदलता रहता है, कोई ऐसा आंकड़ा नहीं है, जिसे परफेक्ट कहा जाए. जो किसी एक व्यक्ति के लिए कम होगा, वह दूसरे के लिए सामान्य हो सकता है, लेकिन रक्त दाब का अत्यंत कम या अधिक होना दोनों ही घातक है.

ह्रदय जितना ज्यादा रक्त पंप करेगा और धमनियां जितनी शंकरी होंगी, बीपी उतना ही ज्यादा होगा. रक्तदाब कम होने से ऑक्सीजन और पोषक तत्व के उत्तको तक नहीं पहुंचने में परेशानी होती है. वैसे तो उम्र के साथ बीपी का बढ़ना एक सामान्य समस्या है. लेकिन एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसे नियंत्रण में रखकर कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है.

हाई ब्लड प्रेशर ( high blood pressure )

हाइपरटेंशन या हाई ब्लड प्रेशर में धमनियों में रक्त दाब बढ़ जाता है. इससे हृदय को रक्त नलिकाओं में रक्त के संचालन के लिए सामान्य से अधिक परिश्रम करना पड़ता है. हाइपरटेंशन हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, किडनी और हृदय रोगों का खतरा बढ़ा देता है. बीपी में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी जीवनकाल को कम कर देती है. हाइपरटेंशन का पता अक्सर देर से चलता है, यही कारण है कि डॉक्टर उसे साइलेंट किलर कहते हैं.

लो ब्लड प्रेशर ( low blood pressure )

लो ब्लड प्रेशर ( 90/60 ) को मेडिकल टर्म में हाइपरटेंशन कहते हैं. वैसे लो बीपी अपने आप में कई बीमारी नहीं, लेकिन यह शरीर में पल रही किसी गंभीर बीमारी जैसे हृदय रोग, तंत्रिका तंत्र की गड़बड़ी का संकेत हो सकता है. गंभीर लो ब्लड प्रेशर ऑक्सीजन और पोषक तत्वों को मस्तिष्क तक पहुंचने से रोकता है, इसलिए इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए.

शारीरिक सक्रियता बढ़ाएं

जो लोग निष्क्रिय होते हैं, उनकी दिल की धड़कन ज्यादा तेज होती है. जितनी ज्यादा आपकी धड़कने तेज होंगी, तो हर संकुचन के साथ आपके हृदय को अधिक काम करना पड़ेगा और आपकी धमनियों पर उतना दबाव पड़ेगा, जिससे रक्त दाब बढ़ जाएगा.

इसलिए शारीरिक रूप से सक्रिय रहें. सप्ताह में कम से कम 5 दिन आधा घंटा वर्कआउट जरूर करें.

मिनी मिल खाएं

दिन मैं तीन बार मेगा मिल खाने की बजाय 5-6 मिनी मिल लें. थोड़ी मात्रा में अधिक बार खाने से रक्त दाब कम नहीं होता, उसे नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है.

कम करे नमक

अधिक मात्रा में नमक का सेवन करने से रक्त का दाब बढ़ जाता है और कम मात्रा में करने से रक्त दाब कम होता है. अगर आप का रक्त दाब अधिक कम होने लगे तो एक गिलास पानी में एक चुटकी नमक डालकर पीने से रक्तदाब में बढ़ोतरी हो जाएगी.

रोज 8-10 ग्लास पानी 

रक्तदाब को आइडियल रेंज में रखने के लिए रोज 8:10 गिलास पानी पिए. जूस, नारियल पानी भी लें, ताकि डिहाईड्रेशन ना हो, डिहाइड्रेशन होने पर निम्न रक्तचाप की समस्या हो जाती है.

हाई बीपी को नियंत्रित करने के उपाय

उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने वाली चीजें आपके किचन में ही उपलब्ध है. घरेलू उपायों से रक्तचाप को नियंत्रित करना बेहद आसान है और इनसे कोई साइड इफेक्ट होने की आशंका भी नहीं.

  • नींबू : सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़ कर पिए या दोपहर के खाने के बाद एक गिलास नींबू पानी पी ले. नींबू रक्त नलिकाओं को मुलायम रखता है.
  • लहसुन : कच्चे लहसुन को सलाद के साथ या सब्जी के साथ खाएं. यह नाइट्रिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड के निर्माण को स्टिम्युलेट कर रक्त नलिकाओं को रिलैक्स रखता है.
  • केला : यह पोटेशियम का अच्छा स्रोत है, जो सोडियम के प्रभाव को कम करता है. रोज 1-2 केला खाना रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक है.

लो ब्लड प्रेशर के उपाय

एक कप शकरकंद का जूस दिन में दो बार पीएं. यह लो बीपी का सबसे अच्छा घरेलू उपचार है. मिट्टी के बर्तन में 32 किसमिस डालें. बर्तन को पानी में से पूरा भर दे. सुबह खाली पेट उन्हें एक-एक कर चबाएं. उसके बाद वह पानी भी पी ले. तुलसी की 10-15 पत्तियों को पीसकर रस निकालने और उसे एक चम्मच शहद के साथ खाली पेट ले.

ब्लड प्रेशर के लक्षण 

चिड़चिड़ापन ज्यादा होना कुछ दिनों से मोड में बदलाव बेचैनी महसूस होना सिर दर्द रहना घबराहट होना समय पर नींद ना आना चक्कर आना आदि हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण है 

अनेक रोगों का कारण है हाई ब्लड प्रेशर 

इस बीमारी से दिमाग में खून की सप्लाई सामान्य के मुकाबले कम हो जाती है, जिससे मेमोरी कमजोर होती है. अत्यधिक गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन रहना भी इस बीमारी की ही देन है. इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति का मूड बदलता रहता है. 

ब्लड प्रेशर

इस बीमारी के कारण किडनी फैलियर, हार्ट फैलियर, स्ट्रोक, हार्ट अटैक, लकवा, ब्रेन हेमरेज जैसी परिस्थितियों से भी सामना करना पड़ सकता है. यदि आप इस बीमारी से दूर रहना चाहते हैं तो मोटापे से दूर ही रहे.
अक्सर मोटापे से ग्रस्त लोगों को शुगर की बीमारी हो जाती है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर का खतरा अधिक बढ़ जाता है. गुस्से को नियंत्रित रखना भी आवश्यक है. इसके अलावा आप मैडिटेशन कर भी खुद को तनाव मुक्त कर सकते हैं. अपने रहन-सहन को भी बदल कर इस बीमारी से निजात पाया जा सकता है. 

ब्लड प्रेशर को मापने का तरीका 

ब्लड प्रेशर की माप 2 तरीके से की जाती है, सिस्टोलिक और डायस्टोलिक. यह इस बात पर निर्भर करती है कि हृदय की मांसपेशियां संकुचित हो रही है या धड़कन स्ट्रेस फ्री हो रही है. 

आराम के समय नार्मल ब्लड प्रेशर 100 से 140 mmhg सिस्टोलिक और 60 से 90 mmhg डायस्टोलिक की सीमा के भीतर होता है. हाई ब्लड प्रेशर तब उपस्थित होता है यदि या 90/140 mmhg पर या इसके ऊपर लगातार बना रहता है. 

हाई ब्लड प्रेशर के रोगी इन विशेष बातों का ध्यान रखें 

नमक कम खाएं, अधिक फाइबर युक्त फल सब्जियों का सेवन करें, प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट का व्यायाम करना चाहिए और वजन कम रखना चाहिए, दवाइयां रेगुलर लेते रहे, डॉक्टर की सलाह पर डोज घटाएं या बढ़ाएं, इसके लिए योग, प्राणायाम आदि काफी कारगर है, लेकिन यह अल्टरनेटिव थेरेपी है.

समय-समय पर ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहें

हाइपरटेंशन का शुरुआती लक्षण नजर नहीं आता, इसलिए इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है. यह जैनेटिक भी हो सकता है. सिर्फ 5% मामलों में किसी बीमारी से होता है लेकिन 95% मामलों में कोई बीमारी कारण नहीं होता.

इस रोग के कारण हार्ट, किडनी आदि अंग प्रभावित होते हैं. काम का बोझ अधिक रहना और व्यायाम नहीं करने के कारण यंग लोगों में भी यह समस्या बढ़ गई है. इसका उपचार ब्लड प्रेशर के लेवल और बीमारी की अवधि पर निर्भर करता है.  

इसका उपाय यही है कि समय-समय पर आप अपना ब्लड प्रेशर जांच करवाते रहें. कंट्रोल करने के लिए सही रहन-सहन, खान-पान, नियमित व्यायाम करना चाहिए. मेंटल स्ट्रेस से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए.

Reference

Read More :- कैसे रहे स्ट्रेस फ्री – stress management in Hindi

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