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स्त्रियों के मानसिक स्वास्थ्य का रखें ख्याल – Mental health – othershealth

मानसिक स्वास्थ्य
मानसिक स्वास्थ्य
Mental health

मानसिक स्वास्थ्य ( mental health )

स्त्रियों के मानसिक स्वास्थ्य – सामाजिक स्तर पर देखें तो वर्तमान में बदलते वक्त के साथ भारतीय महिलाएं घर परिवार की पहली से निकलकर अपनी जॉब प्रोफाइल को मजबूत बनाए हुए हैं| भारतीय महिलाओं के लिए मल्टी टास्किंग नॉर्म्स बन गया है और वे स्वाभाविक रूप से उसे निभाने में सक्षम भी होती है|
लेकिन कई बार मल्टीटास्किंग और महत्वाकांक्षी होने के कारण वे अपनी सेहत के प्रति लापरवाह हो जाती है| खासकर शिफ्ट ड्यूटी करने वाली महिलाएं ज्यादा शिकार होती है| बेशक उन्हें लगे कि नाइट शिफ्ट ड्यूटी करना आरामदायक है|
दिन में घर संभालने के साथ आराम भी कर सकेंगे, जबकि ऐसा संभव नहीं हो पाता| मल्टीटास्किंग स्त्री की कामयाबी के पीछे पारिवारिक माहौल का भी हाथ रहता है| आमतौर पर घर के सदस्य महिलाओं को टोकन फॉर गारंटीड लेते हैं|
काम के साथ उसे परिवार के हर सदस्य की पसंद ना पसंद का ख्याल रखना पड़ता है और तालमेल बिठाना पड़ता है| फैमिली सपोर्ट ना मिलने पर व स्वास्थ्य की अनदेखी करती चली जाती है| और डिप्रेशन का शिकार होने लगती है|

तनाव बढ़ने से हावी होती है बीमारियां 

जब महिलाएं अपनी क्षमता से ज्यादा खुद को कामों में झोकती है, तो मानसिक रूप से 2 कामों से जुड़ी होती है| एक तो दिमागी तौर पर एकाग्रता में कमी आती है| दूसरे, उनके दिमाग में तनाव का स्तर बढ़ जाता है|
जिससे उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन, गुस्सा ज्यादा आने लगता है| छोटी-छोटी चीजें भी शरीर पर असर डालती है, जैसे बार-बार सिर दर्द होना, कमर दर्द रहना, मानसिक धर्म में अनियमितता कई मामलों में इनफर्टिलिटी की संभावना तक देखी जाती है|
स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने से वह परिवार वा करीबियों की छोटी-छोटी बातों पर ओवर रिएक्ट करने लगती है| इससे उनकी इमेज या पहचान में बदलाव आने लगता है| कई बार वह कुछ कामों को अधूरा छोड़ देती है या दूसरों के मुकाबले पिछड़ जाती है|
इसमें उन्हें नाकामयाबी की भावना भी घर कर जाती है| यहां तक कि डिप्रेशन, अनिद्रा, हाइपरटेंशन आदि अन्य मानसिक परेशानियों का शिकार भी हो जाती है|

कहीं देर ना हो जाए 

तनाव के पीछे कई मूल कारण का पता ना चलने पर ही मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए| जबकि कई कामयाब महिलाएं संकोच बस जांच के लिए नहीं जाती| उन्हें लगता है जब वह प्रोफेशनली कामयाब है|
तो उनमें क्या कमी हो सकती है| इस तरह स्ट्रेस को लंबे समय तक झेलती चली जाती है| कई बार स्थिति गंभीर होने पर नकारात्मक हावी हो जाती है और वह कोई गलत कदम उठा देती है| मानसिक स्वास्थ्य नशे का आदी होती है या खुद को नुकसान पहुंचाने लगती है |
किसी स्त्री का अचानक गुस्सा हो जाना, छोटी-छोटी बात पर ओवर रिएक्ट करना, थकान, चिड़चिड़ापन आपको उनका आम स्वभाव लग सकता है, मगर यह डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं, जिसे नजरअंदाज करना कई अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकता है |
विशेषज्ञ बताते हैं कि नए दौर की महिलाएं घर-बाहर, दोनों ही जिम्मेदारियां खुद पर ले रही हैं, जिससे उनमें तनाव का स्तर बढ़ रहा है| यह तब और भी घातक हो जाता है जब फैमिली में से इमोशनल सपोर्ट नहीं मिलता| मानसिक स्वास्थ्य डिप्रेशन से घिरी महिलाएं अक्सर अपनी ही आलोचना करती है |
बीते समय को याद कर खुद को कोसती है| डिप्रेशन जब गहरा जाता है, तब उसे अपने जीने का उद्देश्य नहीं दिखता| ऐसे में आत्महत्या तक का विचार आ सकता है| उनका अधिवेशन पहुंचे इससे पहले उन्हें चिकित्सा की सख्त जरूरत होती है |

केस स्टडी 

वोकेशनल कॉलेज की प्रिंसिपल 40 वर्षीय भारतीय पिछले कुछ समय से काफी परेशान रह रही थी | हर दूसरे दिन सिर दर्द, कमर दर्द की शिकायत होती थी| बेवजह वजन बढ़ता जा रहा था| मानसिक स्वास्थ्य स्वभाव में क्रोध, चिड़चिड़ापन ज्यादा आ गया था |
पति, बच्चों या ससुराल के सदस्यों के साथ किसी ना किसी बात पर रोज तनाव बना रहता था| उन्होंने फिजीशियन को कंसल्ट किया| कई टेस्ट कराए| लेकिन कई कारगर नतीजा नहीं निकला| स्वभाव में आए परिवर्तन को देखते हुए उसे मनोचिकित्सक को कंसल्ट करने के लिए भेजा गया|
मनोचिकित्सक ने केस हिस्ट्री के आधार पर परिवार के सदस्यों से बात की| पता चला कि शिक्षिका का मल्टी टास्किंग होना तनाव की मूल वजह है| घर बाहर का काम करते हुए अपनी जरूरत, यहां तक कि खानपान का भी ध्यान नहीं रख पाती थी|
मनोचिकित्सक ने भारती की काउंसलिंग और साइकोथेरेपी कि, जिसमें परिवार के सदस्यों को भी शामिल किया गया काउंसलिंग के 6-7 से संवाद भारतीय सामान्य महसूस करने लगी|

किया है उपचार की प्रक्रिया मानसिक स्वास्थ्य

मनोवैज्ञानिक मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार करते हैं| सबसे पहले महिला की केस हिस्ट्री और लक्षण देकर या पता लगाते हैं कि उसे वास्तव में परेशानी क्या है| शारीरिक समस्याओं को दूर करने के लिए उपयुक्त दवाई दी जाती है|
परेशानियों के समाधान के लिए काउंसलिंग सेशन किए जाते हैं, जिसमें कई बार कपल-काउंसलिंग, फैमिली-काउंसलिंग, पर्सनैलिटी के कारण एडजस्ट ना कर पाने वाली महिलाओं को साइकोथेरेपी, कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी दी जाती है|
अक्सर ऐसी भी स्थिति होती है कि महिला या परिवार के सदस्य मानसिक तनाव और उसके कारणों को नजरअंदाज करते हैं| जब मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग करके उनके सामने वह चीजें रखते हैं तब उन्हें स्वीकारते हैं|
मरीज की स्थिति के हिसाब से 7 से 8 साइकोथेरेपी काउंसलिंग सेशन किए जाते हैं| 10 से 15 दिन में मरीज खुद को बेहतर महसूस करने लगता है और धीरे-धीरे सामान्य होने लगता है|

किया कहता है रिसर्च 

MIT अमेरिका के न्यूरोसाइंटिस्ट की रिसर्च से साबित हो चुका है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं मल्टीटास्किंग के लिए ज्यादा सक्षम होती है| उनके दिमाग कि संरचना में कुछ ऐसी चीजें होती है, जो इसके लिए महिलाओं की सहायता करती है|
आमतौर पर दिमाग में दो हेमिस्फीयर होते हैं, जिनके बीच में न्यूरॉन्स कनेक्शन होते हैं, महिलाओं में न्यूरॉन्स कनेक्शन ज्यादा होते हैं, जिसके कारण वे मल्टीटास्किंग ज्यादा बेहतर तरीके से कर पाती है|

दिमाग के नियरोंस पड़ता है असर 

रिसर्च से साबित हो चुका है कि कई बार जब हम मल्टीटास्किंग कर रहे होते हैं, तो वास्तव में एक कार्य से दूसरे में तेजी से स्विच करते हैं| दिमाग के लगातार गियर बदलने से तनाव पैदा होता है, जो हमें मानसिक रूप से थका देता है|
इसका असर हमारी कार्यक्षमता पर ही नहीं, दिमाग पर भी पड़ता है| ऐसे में दिमाग से तनाव के लिए जिम्मेवार हार्मोन कॉर्टिसोल एड्रेनललाइन रिलीज होता है, जो हमें तनावग्रस्त कर देता है|
यही नहीं ज्यादा मल्टीटास्किंग करने पर दिमाग के नीयरोंस पर भी असर पड़ता है, क्योंकि जब हम शारीरिक मानसिक सपोर्ट के बगैर ज्यादा मल्टीटास्किंग करते हैं, तो हमारे नियोरोंस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है|

ये 5 मंत्र फॉलो करें 

आत्म-सम्मान मजबूत करें| उन चीजों से बचे, जिनसे एकाग्रता भंग होती है| अपनी पसंद को प्राथमिकता दें| अपने शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करें| बीपी, डायबिटीज, थायरॉयड आदि रोग को नियंत्रण में रखे|
अपनी पीड़ा के बारे में परिवार में खुलकर बात करें| चीजें शेयर करने से मन हल्का होता है और स्ट्रेस लेवल काफी घटता है| थोड़ा समय अपने लिए, अपने शौक, पसंद के लिए भी निकालें| हर दिन आधा घंटा ही सही, योग, एक्सरसाइज मेडिटेशन, वॉक या डांस आदि एक्टिविटी से जुड़े|

क्यों जरूरी है मेडिकल टेस्ट 

अधिकतर महिलाएं सोचती है कि वह पूरी तरह फिट और स्वस्थ हैं| उनके साथ कुछ गड़बड़ी नहीं है| लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि कई गंभीर बीमारियों के लक्षण प्रथम चरण में नजर नहीं आते| मेडिकल टेस्ट जरूर कराएं, ताकि बीमारियों की पहचान उनके उपचार के मौके खत्म होने से पहले कर ली जाए|
कई रोगों की आशंका को जीवन शैली में बदलाव, खान-पान पर नियंत्रण और रेगुलर एक्सरसाइज से ही खत्म किया जा सकता है| ज्यादातर चेकअप बहुत कम समय में आसान और दर्द रहित होते हैं| इन टेस्ट के अलावा अगर आनुवंशिक रूप से आपके परिवार में कोई बीमारी है, तो उसका टेस्ट भी कराए|
समय से टेस्ट कराते रहें और चिकित्सक की सलाह माने| मैमोग्राम के लिए मासिक धर्म के दौरान ना जाएं| जांच के लिए सबसे उचित समय मासिक धर्म के 1 या 2 सप्ताह बाद है| अगर आप गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन कर रही हैं, तो अपने डॉक्टर से इस बारे में जरूर बताएं, पैप स्मीयर टेस्ट के 48 घंटे पहले शारीरिक संबंध ना बनाएं| अपने डॉक्टर से टेस्ट से जुड़े सवाल पूछने में ना घबराए|

सही समय पर जांच से हो जाए सतर्क 

भारतीय महिलाएं अक्सर अपनी आवश्यकताओं को नजरअंदाज करती है| उनकी प्राथमिकता उनका घर और परिवार होता है| हालांकि तेजी से बदलती जीवनशैली, कैरियर और परिवार की दोहरी जिम्मेदारी उनके स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं|
महिलाओं की कई स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जिन्हें रोका जा सकता है या प्रभावकारी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है| अगर समय रहते कुछ टेस्ट करा लिए जाएं| जानिए यह जरूरी टेस्ट कौन-कौन से हैं और किस उम्र में कराना चाहिए|

महिलाओं के लिए सबसे जरूरी टेस्ट 

रक्त में हीमग्लोबिन की मात्रा : नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत की लगभग 50% महिलाओं को एनीमिया यानी खून की कमी है| महिलाओं के लिए रक्त में हीमोग्लोबिन का सामान्य स्तर 12 ग्रामदेसीलिटर होना चाहिए|
कब शुरू करे : 12 की उम्र में|
कितने अंतराल पर : साल में एक बार
Vitamin D deficiency : वैज्ञानिक अनुसंधान मैं यह बात सामने आई है कि महिलाओं में विटामिन डी की कमी का हड्डियों की कमजोरी और अवसाद से सीधा संबंध है| शरीर में विटामिन डी के स्तर का पता लगाने के लिए 25-hydroxy vitamin-D ब्लड टेस्ट सबसे सटीक माना जाता है|
कब शुरू करे : 40 साल उम्र के बाद
कितने अंतराल में : दो साल में एक बार
Calcium deficiency : जैसे जैसे महिलाओं की उम्र बढ़ती है, उनके लिए ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है| रक्त में कैल्शियम के स्तर का पता लगाकर हाइपोकेल्समिया पुष्टि की जाती है| रक्त में कैल्शियम का सामान्य स्तर महिलाओं के लिए 8|8 मिलीग्राम/देसीलीटर है|
कब शुरू करे : 40 की उम्र में
कितने अंतराल पर : साल में एक बार
मैमोग्राम : मैमोग्राम ब्रेस्ट का एक्सरे स्क्रीनिंग है| यह महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट है, जो बिल्कुल सुरूवात मैं ही बेस्ट कैंसर का पता लगा लेता है, जब बाहरी तौर पर इस बीमारी के कोई संकेत या लक्षण दिखाई नहीं देते| क्लीनिकल बेस्ट एग्जामिनेशन किसी डॉक्टर द्वारा किया जाने वाला टेस्ट का फिजिकल एग्जामिनेशन है|
कब शुरू करे : 40 साल के बाद ( अगर आपके परिवार में इस बीमारी का इतिहास है, तो 20 के बाद ही कराएं| )
कितने अंतराल में : cbe 20 साल के बाद साल में एक बार और मैमोग्राम 40 साल के बाद एक बार|
पेप स्मियर टेस्ट : सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा सबसे प्रमुख कारण है| इसमें युटेरस और सर्विक्स में असामान्य कोशिकाओं के विकास की जांच की जाती है| नियमित रूप से स्क्रीनिंग कराने से सर्वाइकल कैंसर से पूरी तरह बचाव संभव है|
कब शुरू करे : 30 साल के बाद
कितने अंतराल में : तीन साल में एक बार
     Reference
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