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प्रीमेच्योर डिलीवरी होने के कारण, लक्षण व बचने के उपाय – premature delivery ke upay

कई बार अनेक कारणों से बच्चे का जन्म समय पूर्व हो जाता है. ऐसे शिशु को गर्भ में विकसित होने के लिए कम वक्त मिल पाता है. अतः इन्हें अक्सर जटिल चिकित्सीय समस्याएं होती है. यदि जन्म के समय समस्या ना भी हो, तो भी उनमें दीर्घकालिक समस्याएं हो सकती है. सभी पहलुओं पर बता रहे हैं दिल्ली व पटना के प्रतिष्ठित न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ.  

अंतिम महावारी के पहले दिन से गिनती करते हुए गर्भधान के 37 हफ्तों से पहले अगर कोई शिशु जन्म ले, तो उसे प्रीमेच्योर बेबी या प्रिमी कहा जाता है. आमतौर पर शिशु 40 सप्ताह तक गर्भ में रहता है. समय पूर्व प्रसव होने से शिशु को गर्भ में विकसित होने के लिए कम वक्त मिल पाता है.

प्रीमेच्योर बच्चे, खासकर बहुत जल्दी पैदा होनेवाले बच्चों को अक्सर जटिल चिकित्सा समस्याएं होती है. समय पूर्व जन्म का सुनिश्चित कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है.

प्री मेच्योर डिलीवरी होने का मतलब किया है? – what I premature delivery in Hindi

यदि बच्चे का जन्म अपेक्षित समय से पहले हो जाए, तो इसे प्री टर्म बर्थ कहते हैं और ऐसे बच्चों को प्रीमेच्योर बेबी कहते हैं. ऐसे शिशु अगले दो-तीन सप्ताह तक नियोनेटॉलजी विभाग में रखे जाते हैं, जहां विशेषज्ञ इनकी हर सांस पर नजर रखते हैं.

समय से पहले प्रसव होने के कारण – premature delivery reason in Hindi

1. यदि पहले भी समय पूर्व प्रसव हो चुका हो. 

2. दो या दो से अधिक बच्चे गर्भ में होना.

3. दो गर्भधारणा के 6 महीनों से कम का वक़्त.

4. इन विट्रो फर्टिलाइजेशन द्वारा गर्भधारण. 

5. गर्भाशय या प्लांसेंस्ता में समस्या होना. गर्भाशय का आसामान्य आकार.

6. सिगरेट, शराब या नशीली दवाओं का सेवन.

7. मां को पर्याप्त पोषण ना मिलना.

8. अपरिपक्व प्रसव पीड़ा का उठना और वक्त से पहले ही मेंब्रेन का टूटना. 

9. यूटीआई, विशेषकर एमनियोटिक फ्लूड और प्रजनन अंग के निचले हिस्से में कोई क्रॉनिक स्थिति, उच्च रक्तचाप और डायबिटीज. 

10. वजन कम या अधिक होना.

11. किशोरावस्था वह 36 साल से अधिक उम्र में गर्भधारण करना. 

12. एक से ज्यादा बार मिसकैरिज या गर्भपात होना. 

13. शारीरिक चोट.

प्री मेच्योर डिलीवरी होने के लक्षण – premature delivery symptoms in Hindi

समय से पूर्व प्रसव की सही जानकारी केवल डॉक्टर देख कर ही दे सकते हैं, लेकिन नीचे हम आपको कुछ लक्षण बता रहे हैं, जिससे आप पता लगा सकते हैं कि आपका प्रसव समय पर होगा कि नहीं.

1. कमर में दर्द

2. योनि से रक्त स्राव.

3. पीठ दर्द.

4. गर्भाशय में तेजी से संकुचन होना. 

5. ग्रीवा में बदलाव. 

6. मूड में बदलाव

7. अत्यधिक नींद आना. 

8. वजन तेजी से घटना या बड़ना. 

9. जी मिचलाना. 

10. डायरिया

समय पूर्व ( प्री मेच्योर ) पर्सव से बच्चे को होने वाली जटिलताएं 

प्रीमेच्योर बेबी का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है. अतः उसे कई समस्याएं होती है. इस संबंध में संकेत व लक्षण इस पर निर्भर होते हैं कि शिशु कितनी जल्दी पैदा हुआ है.

हालांकि, सभी प्रीमेच्योर बेबी को जन्म के समय मुश्किलों का सामना करना नहीं पड़ता है. मगर अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्वस्थ समस्याएं हो सकती है. आमतौर पर जितनी जल्दी बच्चा जन्म लेगा, उसकी जटिलताए जोखिम भी उतना ही अधिक हो रहेगा.

जन्म के समय का वजन भी अहम भूमिका निभाता है. कुछ समस्याएं जन्म के वक़्त स्पष्ट होती है जबकि कुछ अन्य लंबे समय बाद विकसित होती है. इन्हें दीर्घकालीक जटिलताएं कहते है. प्रीमेच्योर बेबी का को यह जटिलताएं हो सकती है जो नीचे निम्नलिखित दिए गए हैं.

एस्फीक्सिया : जन्म के तुरंत बाद शिशु सांस नहीं ले पाता है. इसलिए उसे कृत्रिम सांस की आवश्यकता होती है. 

तापमान संबंधी : नाजुक त्वचा के कारण शारीरिक तापमान कम होता है. इन्हें अतिरिक्त गर्माहट देनी जरूरी होती है. जरूरी होती है. यह इनक्यूबेटर से दी जाती है. 

सांसों की समस्या : आपरिपक्व फेफड़ेव मस्तिष्क के कारण सांस लेने में कठिनाई होती है. सांस लेने की प्रक्रिया में लंबे विराम अपनिया कहते हैं. अपरिपक्व दिमाग व वायुपथ के कारण होता है.

आहार की समस्याबच्चे के रिफ्लेक्स चूसने और निगलने के मामले में कमजोर होते हैं. जिससे उसे अपना आहार प्राप्त करने में मुश्किल होती है. 

संक्रमण : बच्चे की आविकासित रोग प्रतिरोधक प्रणाली की वजह से कई प्रकार के संक्रमण जैसे- रक्त में संक्रमण आदि होते हैं.

हार्ट में समस्या : दिल में छेद होने से हाइपोटेंशन हो सकता है. और हार्ट फेल भी हो सकता है. 

मस्तिष्क में समस्या : 30 हफ्ते से पहले पैदा हुए बच्चों को दिमाग में रक्त स्त्राव का जोखिम रहता है, जिसे इंट्रावेंट्रिकुलर हैम्रेज कहते हैं. अधिकांश हेमरेज हल्के होते हैं और छोटे से अल्पकालिक असर के साथ ठीक हो जाते है.

रक्त समस्या : रक्त संबंधी समस्याओं का जोखिम रहता है, जैसे- एनीमिया और शिशु पीलिया. इनकी वजह से क्रमशः बच्चे को कई बार खून चढ़ाने तथा फोटो थेरेपी की आवश्यकता पड़ती है. 

सेरब्रेल पाल्सी : यह मांसपेशियों का विकार है. यह शिशु के विकासशिल मस्तिष्क में चोट लगने से उत्पन्न होता है. रक्त प्रवाह की खराबी, ऑक्सीजन की कमी, पोषण की कमी या संक्रमण के चलते भी यह समस्या हो सकती है.

खराब संज्ञानात्मक कौशल : ऐसे शिशु विकास के विभिन्न पैमानों पर अपने हमउम्र बच्चों से पिछड़ जाते हैं. उन्हें स्कूल जाने की उम्र में सीखने के मामले में दिक्कत हो सकती है. 

दृष्टि दोष : 30 हफ्ते से पहले पैदा हुए बच्चे में रेटिनोपैथी आफ प्रीमेच्योरिटी पनप सकती है. यह बीमारी तब होती है जब रक्त धमनियां सूज जाती है और रेटीना की प्रकाश के प्रति संवेदनशील पर तंत्रिकाओं की परत में ज्यादा बढ़ जाती है. कुछ मामलों में रेटीना की असामान्य धमनियां रेटिना पर जख्म पैदा कर देती है. उस उसकी जगह से बाहर खींच लेती है. इससे नजर कमजोर हो जाता है और अंधापन हो सकता है. 

सुनने में दिक्कत : प्रीमेच्योर शिशुओं में बहरापन का जोखिम ज्यादा होता है. ऐसे बच्चों के घर लौटने से पहले उनकी श्रावन क्षमता की जांच की जाती है.

दांत की समस्याऐसे बच्चों में दांत देरी से निकलना, दांतों का मलिन होना और पंक्ति गड़बड़ होने जैसी समस्याएं भी होती है. 

मनोवैज्ञानिक समस्याएं : सामान्य बच्चों के मुकाबले प्री टर्म बच्चों में व्यवहार संबंधी और मनोवैज्ञानिक समस्या हो सकती है, जैसे- अवसाद या सामान्य व्यग्रता तथा हमउम्र बच्चों से घुलने मिलने में कठिनाई भी होती हैं.

क्रॉनिक स्वास्थ समस्याएं : ऐसे बच्चे में क्रॉनिक स्वास्थ्य समस्याएं होने की आशंका रहती है, जैसे- संक्रमण, दमा और फील्डिंग की समस्याएं.

हालांकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार के कारण ऐसे वाले शिशुओं के जीवित बचने की संभावनाओं में सुधार हुआ है. लेकिन विकास के मामले में ऐसे बच्चे पिछड़ जाते हैं.

समय पूर्व प्रसव के जोखिम को कम करने के उपाय 

समय पूर्व प्रसव होने का जोखिम होने पर इसे रोकने के लिए उठाए जाते हैं यह कदम – 

रोकथामकारी दवाएंप्रीमेच्योर प्रसव का इतिहास रहा है, तो डॉक्टर दूसरी तिमाही में हार्मोन प्रोजेस्टेरोन की एक किस्म के साप्ताहिक शॉर्ट्स का सुझाव देते हैं. गर्भाशय ग्रीवा छोटा होने पर इसके जोखिम निम्न प्रकार से कम किया जाता है :

1. गर्भावस्था में यौन क्रिया से परहेज करें. 

2. भारी समान ना उठाएं.

3. डायबिटीज और हाई बीपी पर भी नियंत्रण रखें. 

4. मिसकैरिज का जोखिम होने पर सर्वाइकल स्टिच का इस्तेमाल होता है. इससे संक्रमण गर्भाशय में पहुंचकर भ्रूण पर असर कर सकता है. इसके लिए मजबूत टांको का इस्तेमाल होता है, जो गर्भावस्था के 12 से 14 सप्ताह में गर्भाशय ग्रीवा में लगाए जाते हैं और फिर गर्भावस्था के अंत में उन्हें हटा दिया जाता है. तब तक मिसकैरिज का जोखिम गुजर चुका होता है.     

Antibiotic : प्रजनन अंग का संक्रमण प्री-टर्म बर्थ का कारण बन सकता है. इसके लिए एंटीबायोटिक दिए जाते हैं, जो इसके रोकथाम में सक्षम उपचार है.

प्री मेच्योर डिलीवरी होने से कैसे बच सकते है? Prematur delivery se bachne ke upay

समय पूर्व प्रसव को रोकना मुमकिन नहीं, किंतु स्वस्थ गर्भावस्था पूरी तरह से मां की सेहत पर निर्भर करता है इसके लिए –

नियमित जांच करवाएं : प्रसव से पहले डॉक्टर से नियमित जांच कराते रहें. मां और गर्भस्थ शिशु दोनों की सेहत की निगरानी जरूरी है. यदि किसी स्त्री को समय पूर्व प्रसव के कोई लक्षण विकसित हो रहे हैं, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है.  

स्वास्थ्यवर्धक खुराक लेंगर्भावस्था में माता को विटामिनों जैसे फॉलिक एसिड, कैल्शियम, आयरन व अन्य आवश्यक पौष्टिक तत्वों की जरूरत अधिक होती है. इनका सेवन गर्भधारण करने से कुछ महीने पहले से ही शुरु कर देना चाहिए. पूरा आराम और पर्याप्त पानी व तरल पदार्थों का सेवन करें. गर्भावस्था में 11 से 16 किलोग्राम का इजाफा ठीक रहता है. यदि गर्भ में जुड़वा शिशु है, तो अधिक वजन बढ़ाने की आवश्यकता हो सकती है. 

जोखिम वाले पदार्थो से बचे : नशा छोड़ देना चाहिए. इससे समय पूर्व प्रसव हो सकता है  शराब और नशीली दवाएं भी खतरनाक असर करती है. 

गर्भावस्था में अंतर रखे : कुछ अध्ययन बताते हैं कि दो गर्भधारणा में 6 महीने से कम का अंतर प्रीमेच्योर बर्थ का जोखिम बढ़ाता है.

डॉक्टर से अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 

Q. प्रीमेच्योर बेबी का वजन कितना हो सकता है?

Ans : डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2500 ग्राम को लोअर बर्थ वेट कहते हैं.

एलबीडब्ल्यू : यदि वजन 2500 ग्राम से कम हो, तो इसे लो बर्थ वेट कहा जाता है. 

आईयूजिआर : इसमें बच्चा समय पर होता है लेकिन वजन कम होता है.

Q. प्री-टर्म बच्चे को कितने दिन तक हॉस्पिटल में रखना पड़ता है?

Ans प्री टर्म बर्थ मैं बच्चे को 2 से 3 सप्ताह तक हॉस्पिटल में रखना पड़ता है. इनमें इंफेक्शन का खतरा अधिक होता है. बच्चों को मैच्योर होने में 10 दिन लगते हैं. इस दौरान जौंडिस, कैल्शियम की कमी आदि की समस्या हो सकती है. एक-दो हफ्ते तक इन्हें सिर्फ पाइप से फीडिंग कराई जाती है. 

उसके बाद कटोरी चम्मच से फीडिंग कराई जाती है. इससे बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग में जो एनर्जी लगानी पड़ती है, वह नहीं लगानी पड़ती. वजन जब पढ़ना शुरू होता है, तब विटामिन आदि दवाइयां दी जाती है. मां के दूध में कैल्शियम, फास्फोरस और विटामिन डी की मात्रा कम होती है. अतः बाहर से सप्लीमेंट देना पड़ता है.

Q . प्री मेच्योर की समस्या एक बार होने पर दोबारा हो सकता है किया? 

Ans : यह समस्या एक बार होने पर दोबारा हो सकती है. अतः स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलते रहे. 

Q. प्री टर्म बेबी को घर कब लाना चाहिए? 

Ans : बच्चे को घर तब लाएं जब उसका वजन बढ़ने लगे और वह सही तरीके से फीडिंग करने लगे. उस डॉक्टर की सलाह पर घर लाएं.

 Reference

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