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पूरी तरह संभव है ट्यूबरक्लोसिस का उपचार – tuberculosis symptoms in Hindi – othershealth

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ट्यूबरक्लोसिस  ( tuberculosis in Hindi )

ट्यूबरक्लोसिस विश्वभर में मृत्यु के 10 प्रमुख कारणों में से एक है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2018 में पूरे विश्व में एक करोड़ लोग टीबी के शिकार हुए. इनमें 27% मामले केवल भारत में दर्ज किए गए.
अफसोस की बात है कि टीवी का पूरी तरह उपचार संभव होने के बाद भी इनमें से 1500000 लोगों ने गंभीर संक्रमण और समय पर उपचार न मिलने के कारण अपनी जान गवा दी. अतः देर ना करें फौरन उपचार कराएं. विशेषक दे रहे हैं समुचित जानकारी.

ट्यूबरक्लोसिस यानी टीबी माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक बैक्टीरिया से होने वाला एक गंभीर संक्रमण है. यह संक्रमण मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है, लेकिन यह बैक्टीरिया रक्त के प्रवाह के द्वारा दूसरे अंगों में पहुंचकर उन्हें भी संक्रमित कर सकता है.

कुल टीवी के मामलों में से 80% फेफड़ों में होते हैं. बाकी के 20% लिंफ नोड, स्पाइन, किडनी, लीवर, मस्तिष्क, हड्डियों और शरीर के अन्य अंगों में होते हैं. यह संक्रामक रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में खासने और छींकने से निकली छोटी-छोटी बूंदों के द्वारा वायु मार्ग में प्रवेश कर फैल जाता है.

फेफड़ों के अलावा दूसरी कोई टीबी एक दूसरे में नहीं फैलती. टीबी खतरनाक इसलिए है, क्योंकि यह शरीर के जिस हिस्से में होती है, सही इलाज ना हो, तो उसे बेकार कर देती है.

ट्यूबरक्लोसिस के प्रकार ( type of tuberculosis in Hindi )

टीबी के बैक्टीरिया से संक्रमित होने के बावजूद यह जरूरी नहीं है कि आपको टीबी हो ही जाए, क्योंकि ये बैक्टीरिया काफी समय तक हमारे शरीर में छिपकर रह सकते है. जैसे ही आपका immune system कमजोर पड़ता है.
चाहे संक्रमण होने के 15-20 वर्षों बाद भी आप टीवी के शिकार हो सकते हैं. माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस से संक्रमित होने और ट्यूबरक्लोसिस का शिकार होने के आधार पर इस रोग को दो प्रकारों में बांटा जा सकता है.
लेंटेंट टीबी : इस स्थिति में टीबी का संक्रमण तो होता है, लेकिन इसमें बैक्टीरिया शरीर में निष्क्रिय स्थिति में होते हैं और कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. लेटेंट टीवी को इन एक्टिव या निष्क्रिय टीवी भी कहा जाता है.
यह संक्रामक नहीं होते हैं. यह एक्टिव या सक्रिय टीवी में बदल सकते हैं, इसलिए उस व्यक्ति के लिए उपचार कराना जरूरी है, जिसे निष्क्रिय टीवी है. एक अनुमान के अनुसार विश्व भर में लगभग 2 अरब लोग निष्क्रिय टीवी से पीड़ित हैं.

एक्टिव टीबी : यह स्थिति आपको बीमार बना सकती है और दूसरों को भी संक्रमित कर सकती है. यह टीबी के बैक्टीरिया के संपर्क में आने के कुछ ही सप्ताह या वर्षों बाद हो सकती है.

ट्यूबरक्लोसिस बीमारी ( tuberculosis disease in Hindi )

टीबी के अधिकतम मामले ऐसे लोगों में देखे जाते हैं, जो अधिक भीड़भाड़ या गंदे क्षेत्रों में रहते हैं और कुपोषण के शिकार होते हैं. लेकिन यह सिर्फ गरीबों को होने वाला रोग नहीं है क्योंकि इसका प्रमुख कारण धूर्मपान है.
ड्रग्स के आदि लोगों में भी इसकी आशंका बढ़ जाती है. पिछले 10 वर्षों में बच्चों में भी टीवी के मामले काफी तेजी से  बड़े हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, बदली जीवनशैली, खानपान की गलत आदतें और चारदीवारी में कैद होता बचपन भी इसके प्रमुख कारण है.

ट्यूबरक्लोसिस के उपचार ( tuberculosis treatment in Hindi )

टीबी के उपचार के लिए 6 से 9 महीनों तक एंटीबायोटिक लेनी पड़ती है. मरीज को कितने समय तक दवाइयां लेनी पड़ेगी. यह उसकी उम्र, स्वस्थ, संभावित ड्रग रेजिस्टेंस, टीवी के रूप और संक्रमण शरीर के किस भाग में है, उस पर निर्भर करता है.
सरकारी अस्पतालों में इसका मुफ्त इलाज होता है. टीवी का इलाज लंबा चलता है और इसे ठीक होने में 6 महीने से 2 साल तक का समय लग सकता है. एंटीबायोटिक्स का 6 से 8 महीने का कोर्स होता है, जिसे बीच में ना छोड़े.

निर्देश : उपचार के दौरान पोषक भोजन करें और पर्याप्त नींद लें. रोज 30 मिनट हल्के एक्सरसाइज करें. ताकि आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार हो सके.

टीबी के मरीज इन बातों का रखें ख्याल

अगर आपको एक्टिव टीवी है, रोगाणुओं को अपने तक रखें. आप के उपचार में कुछ सप्ताह का समय लग सकता है. यह कदम उठाएं.
ये करे : अगर आपको 3 सप्ताह या अधिक समय तक लगातार खांसी आए. तो डॉक्टर से जांच कराएं. नियमित समय पर डॉक्टर के द्वारा निर्देशित दवाइयों का सेवन करें. छींकते या खांसते समय रुमाल का इस्तेमाल करें.
किया ना करे : जब तक डॉक्टर मना ना करें, दवाइयां लेना बंद न करें. यहां वहां ना थूके. दूसरे लोगों के साथ कमरा शेयर ना करें. उपचार के दौरान पहले तीन-चार सप्ताह तक स्कूल कॉलेज या ऑफिस ना जाए.

रिस्क फैक्टर

वैसे तो टीवी किसी को कभी भी, किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन कुछ कारक है जो इसका खतरा बढ़ा देते हैं जैसे- इम्यून तंत्र का कमजोर होना, कुपोषण, एचआईवी, एड्स का संक्रमण, नशीले पदार्थ का सेवन, डायबिटीज, किडनी डिजीज, कुछ खास कैंसर, रूमटाइट, अर्थराइटिस और सोरियासिस बीमारियों में इलाज के लिए दी जाने वाली दवाइयां.

बचाव के कदम उठाएं

नवजात शिशु को बेसिलस कैलेट्ठे गवोरिं वैक्सीन लगवाए. यह बच्चों को माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरकुलोसिस के गंभीर संक्रमण से बचाता है. व्यस्क के लिए भी वैक्सीन तैयार किया गया है, जिसका ट्रायल चल रहा है. लेकिन इसके अलावा भी आप टीवी के बैक्टीरिया के संक्रमण से बचने के लिए निम्न उपाय करें.संतुलित और पोषक भोजन का सेवन करें, जिसमें दालें, फल, हरी और ताजी सब्जियां हो. नियमित एक्सरसाइज करें. इससे इम्यून तंत्र मजबूत होगा. धर्मपान ना करें और शराब व अन्य नशीली पदार्थों के सेवन से बचें. शारीरिक साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें. संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से बचे. भीड़ भाड़ और गंदगी वाली जगह पर मुंह पर रुमाल रखकर या मस्क लगाकर जाएं.

भारत में स्तिथि

डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत में 4 वर्षों से टीवी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. 2016 में 17.5 लाख लोग टीवी के शिकार हुए 2017 में 18.5 लाख 2018 में 21.57 और 2019 में आंकड़ा बढ़कर 26.9 लाख हो गया देश में प्रति मिनट 3 लोगों की मृत्यु टीबी से होती है. भारत सरकार ने 2025 तक देश में टीवी को खत्म करने का लक्ष्य रखा है. सरकारी और निजी स्तर पर अभियान चलाए जा रहे हैं.

फैक्ट फाइल ( fact file in Hindi )

मेडिकल जनरल ‘दी लैंसेट’ के अनुसार तंबाकू का सेवन टीवी की आशंका बढ़ा देता है. टीवी के कुल मामलों में से 20% धुर्मपान के कारण होते हैं.
‘Lang care foundation’ के अनुसार एचआईवी से पीड़ित लोगों के मृत्यु का प्रमुख कारण टीबी है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2007 के मुकाबले पहली बार 2014 में टीवी के मामलों में बढ़ोतरी हुई.

क्या है डॉट्स ( what is dots in Hindi )

डॉट्स का मतलब है- ‘डायरेक्टली ऑब्जर्व्ड ट्रीटमेंट शॉर्ट कोर्स’. इसमें टीवी की मुफ्त जांच से लेकर मुफ्त इलाज तक शामिल है. इस अभियान में मरीज को स स्वस्थकर्मी के सामने दवा लेनी होती है, ताकि मरीज दवा लेने में किसी भी प्रकार की लापरवाही या गलती ना करें.
स्वास्थ्यकर्मी मरीज और उसके परिवार की काउंसलिंग भी करते हैं. इलाज के बाद भी मरीज की स्थिति के बारे में जानकारी रखी जाती है. इसमें 95% तक सफल इलाज होता है.

टीबी के तीन स्टेज ( stage of tuberculosis in Hindi )

आमतौर पर टीबी को 3 स्टेजो में देखा जा सकता है पहले स्टेज में रोगी के हाथ पैरों में अकड़न महसूस होती है. शाम के समय बुखार आता है और हड्डियों में हल्का दर्द महसूस होता है यह टीबी का पहला स्टेज होता है. यदि इस समय मरीज को टीबी की जानकारी हो जाए, तो ट्रीटमेंट द्वारा छुटकारा मिल जाता है.
दूसरा स्टेज : दूसरे स्टेज में मरीज की आवाज मोटी हो जाती है और शरीर के विभिन्न हिस्सों में दर्द महसूस होने लगता है. यह स्टेज तब आता है जब शरीर में टीबी बैक्टीरिया की संख्या में वृद्धि होने लगती है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है.
तीसरा स्टेज : तीसरे स्टेज में मरीज को तेज बुखार होता है और खांसी के दौरान बलगम के साथ खून आता है. पेशाब के साथ भी खून आता है. इस स्टेज को खतरनाक माना जाता है. इस स्टेज में बैक्टीरिया शरीर में पूरी तरह से हावी हो जाता है.
वैसे आज टीबी का संपूर्ण इलाज संभव है, मगर शुरुआत में इलाज कराने से अधिक फायदा होता है. अक्सर टीबी ठीक होने के बाद भी शरीर के विभिन्न अंगों पर इसके परिणाम देर तक देखने को मिलते हैं.

ट्यूबरक्लोसिस के लक्षण ( tuberculosis symptoms in Hindi )

जब टीबी केबल फेफड़ों को प्रभावित करती है, तब सामान्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं, लेकिन अगर संक्रमण दूसरे अंगों तक फैल चुका है तब प्रभावित अंगों के अनुसार लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं. उदाहरण के लिए स्पाइन टीबी के कारण कमर दर्द हो सकता है और किडनी में टीबी होने से आपके यूरिन में रक्त आ सकता है.
चेस्ट कैंसर के भी कई लक्षण टीबी से मिलते हैं, लेकिन मुख्य फर्क यह है कि कैंसर में मुंह से खून आ सकता है, जबकि चेस्ट कैंसर में सांस लेने में दिक्कत होती है और सीटी जैसी आवाज आती है. टीवी में सांस लेने में दिक्कत नहीं होती और बुखार आता है.

यह लक्षण नजर आए तो हो जाए सतर्क.

1. तीन सप्ताह से अधिक लगातार खांसी बने रहना.
2. बलगम में खून आना, थकान महसूस होना, रात में अचानक पसीना आना, वजन एकदम से कम हो जाना, शाम के समय हल्का बुखार रहना, भूख कम लगना, सांस लेने में दिक्कत महसूस होना, पेशाब में खून आना,

दवा का कोर्स बीच में छोड़ने से होता है एमडीआर टीबी का खतरा ( MDR tuberculosis in Hindi )

टीबी होने के बाद यदि मरीज दवा का सेवन नियत मात्र अवधि में नहीं करता है, तो कुछ समय के बाद इस टीबी पर दवा का असर समाप्त हो जाता है. अर्थात टीबी का बैक्टीरिया दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो जाता है. इसी को एमडीआर टीबी या मल्टीड्रग रेजिस्टेंट टीवी कहते हैं.
यह रोग सामान्य टीबी से कहीं अधिक घातक है. एमडीआर टीबी के रोगी के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को भी mdr-tb हो जाता है. इस रोग में मरीज का ट्रीटमेंट अलग तरीके से होता है. इसकी दवाइयां आम टीबी से अलग होती है.
क्योंकि एक बार यदि एमडीआर टीबी हो गया तो आम टीवी की दवाइयां असर नहीं करती है. एमडीआर टीबी सबसे ज्यादा उन मरीजों को होती है, जो टीबी की बीमारी का पूरा इलाज नहीं कराते. इलाज बीच में छोड़ देने के कुछ समय बाद यह एमडीआर टीबी के तौर पर देखने को मिलता है.

Referenc

Health Expertshttps://othershealth.in
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