Home Disease कहीं आंखों की रोशनी चुरा ना ले ग्लूकोमा

कहीं आंखों की रोशनी चुरा ना ले ग्लूकोमा

ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) glaucoma in Hindi 

ग्लूकोमा :- आंखें हमारे शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इनकी सहायता से ही हम दुनिया को देख-समझ पाते हैं. इनकी देखभाल में लापरवाही से अनेक ऐसे रोग हो सकते हैं, जो दृष्टि को छीन सकते हैं. 

ऐसे ही एक रोग है ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) जिसे ‘ साइलेंट थीफ ऑफ विजन’ भी कहा जाता है. यह किस प्रकार आंखों को नुकसान पहुंचाता है और इससे बचाव के उपाय क्या है, बता रहा है देश के प्रतिष्ठित डॉक्टर्स. 

ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) किया है ?

बदलती जीवन शैली में आंखो कि यह बीमारी सामान्य होती जा रही है. इसे काला मोतिया भी कहा जाता है. इस बीमार की खास बात है कि इसके लक्षण काफी देर से पता चलते हैं और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) कैसे होता है ?

आंखों के अंदर एकवेस हुमर नामक तरल पदार्थ होता है. यह आंखों को पोषित करने के अलावा भी कई लाभदायक कार्य करता है. इस तरल पदार्थ का आंखों में सक्रिय रहना बेहद आवश्यक है.

आंखों के अंदर की नसों में जब इस तरल पदार्थ का दबाव ज्यादा पड़ने लगता है, तो ग्लूकोमा नामक बीमारी होती है. लंबे समय तक इस तरल पदार्थ का दबाव बने रहने पर आंखों की ऑप्टिव नर्व को भी खतरा होने लगता है.

जिससे यह नार्व नष्ट भी हो जाती है. यही ऑप्टिव नर्व आंखों और दिमाग के बीच संदेशों का आदान-प्रदान करती है. इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की आंखों की रोशनी पूरी तरह जा सकती है अथार्थ व्यक्ति पूरी तरह से अंधा भी हो सकता है. 

यह बीमारी आमतौर पर 40 साल के बाद ज्यादा देखने को मिलती है, लेकिन कुछ कारणों से यह युवाओं में भी हो सकता है. हाई प्रेशर का बढ़ना ग्लोमो का मुख्य कारण है. 

इससे ऑप्टिक नर्व क्षतिग्रस्त हो जाता है. यह नर्व दिमाग और आंखों के बीच संदेशवाहक का कार्य करता है. इसके क्षतिग्रस्त होने से आंखों की रोशनी अस्थाई रूप से चली जाती है. लक्षणों का पता नहीं चलने के कारण ही इसे साइलेंट थीफ ऑफ विजन भी कहा जाता है.

ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) के लक्षण 

ग्लूकोमा से ग्रस्त मरीज को इसके लक्षण समझने में काफी कठिनाई होती है निम्न इलेक्शन ओके दिखाई देने पर इसकी आशंका हो सकती है- अगर चश्मे का नंबर बहुत जल्दी बदल रहा हो. आंखों के सामने धब्बा या रंगीन बिंदु बन जाना.

आंखों से धुंधला दिखने की शिकायत, रोशनी में दिक्कत महसूस होना, किसी निश्चित समय में कम दिखाई देता हो, आंखों में दर्द रहना, शुगर और दिल की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को अगर आंखों में परेशानी होने लगे. 

ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) का उपचार 

ग्लूकोमा से पीड़ित मरीजों को इसके लक्षण का पता चलते ही तुरंत इलाज शुरू करा लेना चाहिए. ग्लूकोमा की बीमारी के लिए बाजार में कई तरह के ड्रग्स मौजूद है.

चिकित्सक की सलाह पर इनका सेवन किया जा सकता है. इन दवाइयों से ग्लूकोमा को बढ़ने से रोका जाता है. हालांकि अभी तक ऐसे ड्रग्स इजाद नहीं किए गए, जिनसे ऑप्टिक नर्व को ठीक किया जा सके.

मगर यदि समय पर इस बीमारी का इलाज शुरू हो जाता है तो मरीज अंधेपन से बच सकता है. विभिन्न प्रकार के ग्लूकोमा का इलाज अलग-अलग तरीके से किया जाता है. सर्जरी से एकवस हियमर के प्रवाह में आई रुकावट को दूर कर इसका इलाज करना अब संभव हो चुका है.

ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) के मरीज इन बातों का रखें ध्यान 

एक बार में ज्यादा पानी ना पिए, ताई को टाइट से ना पहने, की शीर्षासन से बचे आदि. 

कई प्रकार के होते हैं ग्लूकोमा ( काला मोतिया )  

  1. नॉरमल एंगल ग्लूकोमा : इसमें पीड़ित की आंखों के अंदर की ऑप्टीक नर्व नष्ट हो जाती है. यह बीमारी धीरे-धीरे अपना रूप धारण करती है. इसलिए इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी आंखों की रोशनी को होता है.
  2. Open angle glaucoma : इसे क्रॉनिक ग्लूकोमा भी कहा जाता है. इसमें आंखों के अंदर का तरल पदार्थ अपनी मूल जगह ना जाकर अन्य हिस्सों में चला जाता है, इससे आंखों के अन्य अंदरूनी हिस्सों में इस तरल पदार्थ का दबाव बढ़ जाता है. इससे आंखों की रोशनी कमजोर होने लगती है. 
  3. Primary angle closure glaucoma : इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की आंखों के अंदर तरल पदार्थ का दवाब अचानक ही बढ़ जाता है. यह एक त्वरित प्रक्रिया होती है और इसका इलाज भी तुरंत कराना पड़ता है. इसमें मरीज की आंखों की दृष्टि अचानक ही कम हो जाती है.
  4. कैन जेनिटल ग्लूकोमा : ग्लूकोमा का यह प्रकार अधिकांश नवजात शिशुओं में देखने को मिलता है. नवजात शिशु जन्म से ही इस बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं. बड़े होने पर इसका असर दिखता है. बच्चे को रोशनी में जाने पर आंखों में पानी आने की शिकायत होती है. 
  5. Secondary glaucoma : यह प्रकार तब देखने को मिलता है जब आंखों में कोई चोट या किसी अन्य वजह या बीमारी से आंखों पर प्रभाव पड़ता है. किसी दुर्घटना में क्षतिग्रस्त होने पर य आंखों के गहरी चोट लगने पर यह हो सकती है.

क्या है नजर की कमजोरी ?

यह वह स्थिति है, जब कोई व्यक्ति चश्मा, कांटेक्ट लेंस, दवाई और सर्जरी के बाद भी साधारण काम करने में भी कुछ को अक्षम पाता है. जानते हैं ग्लूकोमा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य. 

क्या करें जब आंखों की समस्या हो ?

नेत्र रोग विशेषक से मिले. आंखों पर लिखे विशेषगो के लेख से मदद लें. अच्छे विशेषग समूह से संपर्क करें, जिनमें आंख, काम दृष्टि व प्रतिरोपण के विशेषज्ञ हो. 

आंखों की कमजोरी के कारण 
आंखों की बीमारी या स्वस्थ की गड़बड़ी, आंख में चोट लगने के कारण, या फिर पैदाइशी. 

आंकड़ों में :- 3.7 करोड़ विश्व में नेत्रहीन है, 1.5 करोड़ भारत में नेत्रहीन है, 65 या अधिक उम्र के लोग कम दृष्टि वाले हैं. 

भारत को नेत्रदान और विशेषज्ञों की जरूरत
हर साल ढाई लाख नेत्रदान की जरूरत, सालाना 25000 आंखे दान में मिलती है, इनमें से 30% बेकार हो जाती है, 40,000 डॉक्टर चाहिए, जिसमें से आठ हजार मौजूद है.

ग्लूकोमा की जांच

टनोमेट्री जांच : यह जांच ग्लूकोमा के लिए की जाती है. इस जांच के द्वारा आंखों के अंदर तरल पदार्थ के दबाव को मापा जाता है. जांच के दौरान एक खास किस्म का आई ड्रॉप आंखों को सुन करने के लिए डाला जाता है. 
इसके बाद डॉ एक खास यंत्र टोनोमीटर की सहायता से आंखों के अंदर आंतरिक दबाव को मापते हैं. एक सामान्य आंख के लिए दवाब 12 से 22 mmhg होता है. आमतौर पर ग्लूकोमा पीड़ितों की आंखों का दवाब 20 mmhg से ज्यादा होता है.

ग्लूकोमा के रिस्क फैक्टर

ग्लूकोमा सामान्यत: वैसे लोगों को होती है, जो 50 साल से अधिक के होते हैं. अगर माता-पिता या परिवार में कोई ग्लूकोमा से ग्रस्त हो, तो बच्चों को होने की संभावना अधिक हो जाती है.  

निकट दृष्टि दोष या मायोपिक व्यक्ति में ग्लूकोमा होने की संभावना अधिक होती है, अगर आंखों के अंदर दबाव सामान्य स्थिति से अधिक हो, तो ग्लूकोमा होने की संभावना बढ़ जाती है. 

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