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पेट के रोगों में लाभकारी है अर्धपादम पदोत्तानासन – ardhpadm padottanasana

अर्धपादम पदोत्तानासन

अर्धपादम पदोत्तानासन – शरीर स्वास्थ्य है, तो संपूर्ण संपूर्ण जीवन यात्रा ही बहुत सरल सफल व सुफल हो जाता है. निरोग शरीर के लिए सम्यक आहार, सम्यक व्यायाम और सम्यक निद्रा अति आवश्यक है. योग शास्त्र में योगासन को पूर्ण व्यायाम कहा गया है, जो शरीर को लचीला, सबल व निरोगी बनाता है और रोग निरोधक क्षमता बढ़ाता है.

अधिकतर लोगों की शारीरिक गतिविधियों में समन्वय नहीं रहता, जिसके कारण असंतुलन आता है और शरीर को अचानक गिरने या चीजों से टकराने से बचने के लिए लगातार अतिरिक्त प्रयास करते रहना पड़ता है.

संतुलन के आसन मस्तिष्क केंद्र, लघु मस्तिष्क को विकसित करते हैं, जो शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है. यह आसन शारीरिक संतुलन लाते हैं, जिससे अचेतन रूप से होने वाली शारीरिक हलचल समाप्त हो जाती है.

शारीरिक संतुलन प्रदान करने के साथ-साथ इस समूह के आसन संतुलन मन एवं जीवन के प्रति अधिक परिपक्व दृष्टि का विकास करते हैं. इन आसनों का अभ्यास करते समय मन को स्थिर करने के लिए किसी बिंदु पर एकाग्र होना अति आवश्यक है.

संतुलन के आसनों का अभ्यास करते समय दीवार पर एक काले बिंदु या चिन्ह को एकटक देखने से कठिन स्थितियों में भी अधिक समय तक शारीरिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है.अर्धपादम पदोत्तानासन योगा शारीरिक संतुलन में बेहद उपयोगी है

अर्धपादम पदोत्तानासन आसन विधि:

पैरों को सामने फैला कर बैठ जाएं. बाएं घुटने को मोड़ने और बाएं पंजे को अर्ध पद्मासन की स्थिति में दायी जांग के ऊपर रखें. दाहिने घुटने को मोड़ने और तलवे को जमीन पर रखें. भुजाओं के अग्रभाग दाएं जांघ के नीचे बांध ले.

सामने किसी बिंदु पर दृष्टि केंद्रित करें. पीछे की ओर झुके. धीरे से दाहिने पैर को ऊपर उठाएं और घुटने को सीधा करें. नितंबों के पिछले भाग पर अपना संतुलन बनाए, उठे हुए पैर को आपस में बंधी हुई भुजाओं के सहारे शरीर के निकट लाएं.

जब तक आराम से संभव हो, अंतिम स्थिति में रहें. दाहिना घुटना मोड़े. पंजे को जमीन पर नीचे लाएं और पैरों को सामने फैला दें. दूसरे पैर से इसकी पूर्णआवृत्ति करें.

श्वसन: बैठी हुई स्थिति में सांस लें. अंतिम स्तिथि में आते समय और उसमें रुकते समय श्वास अंदर रोककर रखें. पंजे को जमीन पर लाने के बाद स्वास छोड़ें.

अवधि: प्रत्येक पैर से अधिकतम पांच अवरित्तियां करें.

सजगता: शारीरिक एक निश्चित बिंदु पर दृष्टि केंद्रित का संतुलन बनाए रखने पर. आध्यात्मिक स्वाधिष्ठान चक्र पर.

आसन के लाभ

यह आसन पद्मासन के लिए पैरों को तैयार करता है. यह तंत्रिका तंत्र को भी संतुलित करता है और आंतों के क्रमां कुचन को उत्प्रेरित कर कब्ज दूर करता है. इस आसन की पूर्ण स्थिति में मेरुदंड, कमर व सिर एक सीधी रेखा में स्थिर हो जाते हैं, जो कुण्डलिनी शक्ति को सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा उधरवगमण में बहुत सहायक है.

यह मन की चंचलता को दूर कर मानसिक तनाव से छुटकारा दिलाता है एवं कामवासना को शांत करता है. हर्निया, बवासीर और यौन रोगों की संभावना को मिटाता है. इसके अभ्यास से जठराग्नि पर्डिप्त होती हैं.

पाचन शक्ति बढ़ती है, कब्ज, अजीर्ण, पेचिस एवं पेट के रोगों में लाभकारी है. कमर एवं लंबर जोड़ों के दर्द में लाभकारी है. स्नायु तंत्र, नर्वस सिस्टम को शांत एवं सक्रिय करता है. जंघा, पिंडलियों टखनों और घुटनों को मजबूत बनाता है. जनन अंगों को पुष्ट करता है.

नियम

इसे खाली पेट एवं स्नान के बाद करना उपयुक्त है. भोजन के 3 से 4 घंटे बाद भी इसे कर सकते हैं. जमीन पर मोटी चादर अथवा मोटी दरि कंबल बिछाकर इसे करना चाहिए.

सावधानी

जिनके घुटने व टखने में दर्द है या लचीले नहीं है, उनके लिए यह आसन वर्जित है. साइटिका के रोगी इसे ना करें. यह उन साधकों के लिए उपयोगी है, जिनका शरीर लचीला व रोग मुक्त है. गर्भवती स्त्रियों को भी इसे नहीं करना चाहिए. किसी भी तरह की पीड़ा होने पर आसन को तुरंत छोड़ दें.

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